वाख की व्याख्या - Chapter - 10th Class- 9th Hindi -क्षितिज

वाख की व्याख्या - Chapter - 10th  Class- 9th Hindi -क्षितिज

 कवि परिचय   ( ललद्यद )

  • कश्मीरी भाषा की लोकप्रिय संत – कवियत्री
  • ललद्यद का जन्म सन 1320 के लगभग कश्मीर स्थित पाम्पोर के सिमपुरा गाँव में हुआ था। 
  • उनके प्रारंभिक जीवन के बारे में ज्यादा जानकारी मौजूद नही है।
  • इनका देहांत सन 1391 में हुआ। 
  • इनकी काव्य शैली को वाख कहा जाता है।

( सन्दर्भ )

  • रस्सी कच्चे धागे की, खींच रही मैं नाव।
  • जाने कब सुन मेरी पुकार, करें देव भवसागर पार ।
  • पानी टपके कच्चे सकोरे, व्यर्थ प्रयास हो रहे मेरे।
  • जी में उठती रह-रह हूक, घर जाने की चाह है घेरे।।

( व्याख्या )

  • प्रस्तुत पंक्तियों में कवयित्री ने नाव की तुलना अपनी  जिंदगी से करते हुए कहा है की वे इसे कच्ची डोरी यानी साँसों 
  • द्वारा चला रही हैं।  वह इस इंतज़ार में अपनी जिंदगी काट रहीं हैं की कभी प्रभु उनकी पुकार सुन उन्हें इस जिंदगी से पार करेंगे। 
  • उन्होंने अपने शरीर की तुलना मिट्टी के कच्चे ढांचे से करते हुए कहा की उसे नित्य पानी टपक रहा है यानी प्रत्येक दिन उनकी उम्र कम होती जा रही है। 
  • उनके प्रभु-मिलन के लिए किये गए सारे प्रयास व्यर्थ होते जा रहे हैं
  • उनकी मिलने की व्याकुलता बढ़ती जा रही है। असफलता प्राप्त होने से उनको गिलानी हो रही है, उन्हें प्रभु की शरण में जाने की चाहत घेरे हुई है।

( सन्दर्भ )

  • खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं,
  • न खाकर बनेगा अहंकारी।
  • सम खा तभी होगा समभावी,
  • खुलेगी साँकल बंद द्वार की।

( व्याख्या )

  • इन पंक्तियों में कवियत्री ने जीवन में संतुलनता की महत्ता को स्पष्ट 
  • करते हुए कहा है की केवल भोग-उपभोग में लिप्त रहने से कुछ किसी को कुछ हासिल नही होगा, 
  • वह दिन-प्रतिदिन स्वार्थी बनता जाएगा। 
  • जिस दिन उसने स्वार्थ का त्याग कर त्यागी बन गया तो वह अहंकारी बन जाएगा जिस कारण उसका विनाश हो जाएगा। 
  • अगले पंक्तियों में कवियत्री ने संतुलन पे जोर डालते हुए कहा है की न तो व्यक्ति को ज्यादा भोग करना चाहिए ना ही त्याग
  • दोनों को बराबर मात्रा में रखना चाहिए जिससे समभाव उत्पन्न होगा। 
  • इस कारण हमारे हृदय में उदारता आएगी और हम अपने-पराये से उठकर अपने हृदय का द्वार समस्त संसार के लिए खोलेंगे।

( सन्दर्भ )

  • आई सीधी राह से, गई न सीधी राह|
  • सुषुम-सेतु पर खड़ी थी, बीत गया दिन आह!
  • जेब टटोली, कौड़ी न पाई।
  • माझी को दूँ, क्या उतराई ?

( व्याख्या )

  • इन पंक्तियों में कवियत्री ने अपने पश्चाताप को उजागर किया है। 
  • अपने द्वारा पमात्मा से मिलान के लिए सामान्य भक्ति मार्ग को न अपनाकर हठयोग का सहारा लिया। 
  • अर्थात् उसने भक्ति रुपी सीढ़ी को ना चढ़कर कुण्डलिनी योग को जागृत कर परमात्मा और अपने बीच सीधे तौर पर सेतु बनाना चाहती थी । 
  • परन्तु वह अपने इस प्रयास में लगातार असफल होती रही और साथ में आयु भी बढती गयी । 
  • जब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी और उसकी जीवन की संध्या नजदीक आ गयी थी अर्थात् उसकी मृत्यु करीब थी ।
  • जब उसने अपने जिंदगी का लेखा जोखा कि तो पाया कि वह बहुत दरिद्र है और उसने अपने जीवन में कुछ सफलता नहीं पाया या कोई पुण्य कर्म नहीं किया 
  • और अब उसके पास कुछ करने का समय भी नहीं है।
  • पार पाने के लिए परमात्मा जब उससे पार उतराई के रूप में उसके पुण्य कर्म मांगेगे 
  • तो वह ईश्वर को क्या मुँह दिखाएगी और उन्हें क्या देगी क्योंकि उसने तो अपनी पूरी जिंदगी ही हठयोग में बिता दिया । 
  • अपने इस अवस्था पर पूर्ण पछतावा हो रहा है पर इससे अब कोई मोल नहीं क्योकि जो समय एक बार चला जाता है वो वापिस नहीं आता । 
  • अब पछतावा के अलावा वह कुछ नहीं कर सकती।

( सन्दर्भ )

  • थल-थल में बसता है शिव ही.
  • भेद न कर क्या हिंदू-मुसलमां।
  • ज्ञानी है तो स्वयं को जान,
  • वही है साहिब से पहचान।।

( व्याख्या )

  • इन पंक्तियों में कवियत्री ने बताया है की ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, वह सबके हृदय के अंदर मौजूद है। 
  • इसलिए हमें किसी व्यक्ति से हिन्दू-मुसलमान जानकार भेदभाव नही करना चाहिए। 
  • अगर कोई ज्ञानी तो उसे, स्वंय के अंदर झांककर अपने आप को जानना चाहिए, 
  • यही ईश्वर से मिलने का एकमात्र साधन है।

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